रविवार, 7 नवंबर 2010

तीन फिरकियाँ
       १  

मुफलिसी का
आलम
कुछ इस तरह हुआ
पैबन्दों से
पोशिदा जिस्म
फैशन  हुआ !

       २ 

क्यों कर
मेरे इश्क का
इश्तहार
हर जुबां से हुआ
मुख़तसर सी ही
तो बात थी
उनका मेरे कूचे से
गुज़र कर जाना  !

       ३ 

वो इंतिहा 
सितम की 
कुछ इस तरह 
कर गया 
लुट कर चैन रातों का 
ख्वाबों से भी 
मरहूम कर गया !

2 टिप्‍पणियां:

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

sundar rachna

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

Sunil Kumar ने कहा…

तीनों शेर बहुत खुबसूरत बधाई