रविवार, 13 फ़रवरी 2011

दुक्की


मैं
प्रेम और समर्पण
के मध्य की
रिक्तता को
पुरता गया
और ..........
'खाली' होता गया !


वो
मेरी खेरियत
को लेकर
फिक्रमंद सा
दिखता है /
उसका तरकश
अभी भरा नहीं है !

2 टिप्‍पणियां:

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

दुक्की....पक्की है। बहुत खूब लिखा है, प्रेम और समर्पण की बीच की रिक्तता...यही वो खाली पन है जो जीवन को रीत दिया करता है। दूसरी क्षणिका दिमाग पर जोर डालकर समझ में आई। इतना तीखा व्यंग्य है कि सिर्फ दाद देता हूं।

हरीश सिंह ने कहा…

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