मंगलवार, 28 सितंबर 2010

आई है सदा ये कैसी
दिल को ही भेद गया कोई

                               शहरों के कुचें हुए ये कैसे
                               मकां ही मकां है घर ले गया कोई

पोशीदा थी इज्जत ओ आन जो कभी
पेशानी पर दाग लगा गया कोई

                               कह्कहें महफिल के खामोश हुए ऐसे
                               शमा ए महफिल बुझा गया कोई

परवाज़ परिंदों की आसमाँ रही नहीं
खेतों में आग लगा गया कोई

                             सजती नहीं अब मेहंदी शह-बाला के हाथों में
                             राख बारूद की देखो मल गया कोई

तलबगीरों के लिए सुधीर, न नज्म है न नगमें
'कलम' को ही कलम कर गया कोई

1 टिप्पणी:

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

eeraamसुधीरजी,
रचना में दिखाई तो यह दे रहा है कि यह गज़ल का पुट लिये हुए हैं, किंतु गज़ल नहीं कही जायेगी, क्योंकि गज़ल में मात्राओं आदि का गम्भीर गणित होता है, जिससे अभिव्यक्ति अत्यधिक पुष्ट होकर भी निखरती है। अब यदि मैं सिर्फ एक रचना के लिहाज़ से पढूं तो निस्संदेह आपके भावों का अध्ययन कर सकता हूं। मुझे लगता है, मेरा व्यक्तिगत कहना है कि यदि आप ऐसे बेहतरीन शब्दों का जब इस्तमाल करते हैं तो इसे गज़ल का आकार न दें, क्योंकि आम पाठक इसे गज़ल मान कर ही पढेगा और उसे उतना मज़ा नहीं आयेगा। आप अपने भावों को सामान्य कविता के लहज़े में कहें तो मज़ा बरकरार रहेगा। मैं जानता हूं आपने गज़ल के लिहाज़ से लिखा भी नहीं होगा क्योंकि..आप बस अपने भावों को सुन्दराकृति देना चाहते हैं.., इसीलिये मैं कह रहा हूं कि बेहतरीन भाव हैं..बहुत खूबसूरती से लिखी है आपने रचना..। किंतु गज़ल मान कर पढने वाले इसके भावों में उतर नहीं पायेंगे। बहरहाल, हर शब्द अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहे हैं..और यह भी कि आपमे गहराई से सोचने और उसे उकेरने के ईश्वरीय गुण हैं।